विवाह एवं तलाक (Marriage & Divorce)

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विवाह एवं तलाक

(Marriage & Divorce)

 

A Sword is a Sword Even if I call it Needle

 

विवाह एक ऐसा शब्द है जिससे तकरीबन हर व्यक्ति परिचित है परन्तु समस्या यह है की विवाह का असली मतलब शायद ही किसी को पता हो | उससे भी बड़ी बात शायद विवाह हमारे सामने इस तरह से रखा गया है की शायद ही कोई व्यक्ति (पुरुष एवं महिला दोनों) ऐसा हो जिसने विवाह करने के बारे मैं न सोचा हो कुछ व्यक्ति (अधिकांश भारतीय) तो इससे भी आगे जाकर यह सोचते है की यदि विवाह नहीं किया तो जीवन बर्बाद हो जायेगा इस सोच के पीछे कारण भी आसानी समझा जा सकता है |

अभी कुछ दिन पहले एक बहुत पुराना सीरियल महाभारत देखने का अवसर मिला बचपन मैं कभी महाभारत देखा था परन्तु उस वक़्त उम्र के उस दौर से गुजर रहे थे की मनोरंजन ही अधिक महत्वपूर्ण था आज उम्र का वह दौर है जब मनोरंजन के साथ सोच विचार की आंधी भी चलती है | महाभारत देखते वक़्त एक घटना का जीकर किया जाना आवशयक है जब महाराज पाण्डु अपनी पत्निओं के साथ जंगल मैं वक़्त गुजर रहे थे उस वक़्त एक ऋषि उनको पितृ ऋण के बारे मैं बताते है जो की संतान उत्पति के द्वारा ही उतारा जा सकता है जब पाण्डु श्राप के कारण संतान उत्पति मैं असमर्थ हो जाते है तब महाराज पाण्डु इतने अधिक व्याकुल दिखते है क्योंकि उनका इस संसार मैं आना पूर्ण रूप से सफल नहीं हुआ और स्वर्ग मैं प्रवेश नहीं हो सकता |

महाराज पाण्डु एक सफल और प्रजापालक राजा और हर तरह से सम्पन व्यक्ति है परन्तु उनके सामने संतान उत्पति इतनी अधिक महत्वपूर्ण है को वह खुद को असफल व्यक्ति मानना आरम्भ कर देते है जिस वक़्त महाराज पाण्डु हुए उस वक़्त शायद यह सोच सही रही हो उस वक़्त भारत की जनसँख्या कम रही होगी और लड़ाइयों एवं अन्य कारणों जैसे की जंगल और जंगली जानवरों के हमले, बिमारियों आदि के कारण मृत्यदर काफी अधिक रही होगी इसीलिए संतान उत्पति survive करने के लिए आवश्यक रहा होगा शायद इसी कारण संतान उत्पति को धर्म (स्वर्ग नरक और पता नहीं क्या क्या) के साथ जोड़ दिया गया |

परन्तु क्या यह इतना आवश्यक रहा होगा की यदि कोई संतान उत्पन नहीं कर सकता को अपना जीवन ही व्यर्थ समझने लगे शायद ऐसा इसीलिए था क्योंकि संतान उत्पति को धरम के साथ जोड़ दिया गया वर्तमान मैं हमारी जनसँख्या बहुत अधिक है तो क्या वर्तमान में भी संतान उत्पति उतनी ही आवशयक है ? मेरे विचार से नहीं परन्तु अधिकांश इसे धर्म से जुड़े होने के कारण आज भी अति आवशयक मानते है|

जब संतान उत्पति एक अति आवशयक कार्य बन कर सामने आती है तो  भारतीयों के लिए विवाह भी एक अति महत्वपूर्ण संस्था के रूप मैं उभर कर सामने आती है (हलाकि अब हालत कुछ सुधरने लगे है और आने वाले वर्षों में और बेहतर होंगे) संतान उत्पति के लिए विवाह आवश्यक नहीं है परन्तु भारतीय संस्कृति मैं विवाह ही स्त्री पुरुष सम्बन्ध का एकमात्र रूप रहा है आज बदलते वक़्त के साथ स्त्री पुरुष सम्बन्ध सिर्फ विवाह तक ही सीमित नहीं रहा गया है ऐसे मैं क्या विवाह उतना ही महत्वपूर्ण रह गया है ?

शायद नहीं

परन्तु यह विवाह नमक संस्था की कल्पना किसने की क्या इसे भगवन ने बनाया?

हमारे समाज मैं विवाह की आवशयकता को इस हद तक हावी हो चुकी है की अधिकांश लोग इसे भगवान निर्मित मानते है एक बहुत ही सामान्य इस्तेमाल करने वाली स्टेटमेंट ‘जोड़ियां स्वर्ग मैं बनती हैं‘ परन्तु यह सत्य नहीं है शायद आज कोई नहीं जानता की विवाह नमक संस्था की परिकल्पना किसने की परन्तु यह निश्चित है की किसी मानव ने हज़ारों साल पहले विवाह नामक संस्था की कल्पना की ताकि उसका समाज अच्छी तरह चल सके और यह कल्पना इतनी अधिक पॉपुलर हुई की सामान्यता जहां जहां मानव समाज निर्मित हुआ विवाह किसी न किसी रूप मैं प्रचलित हो गया

शायद इस संस्था के सफल होने का मुख्य कारण यह रहा की इस संस्था के नियम और कायदे बहुत सोच समझ कर बनाये गए थे हर संस्था कुछ नियमों पर चलती है बिना नियमों के कोई संस्था बनाई तो जा सकती है परन्तु उसे चलाया नहीं जा सकता शायद विवाह नमक संस्था के नियम बहुत सोच विचार कर बनाये गए थे की उन नियमों ने संस्था की सफलता सुनिश्चित की विवाह नमक संस्था का एक धार्मिक पहलु भी दिखाई देता है और शायद विवाह नमक संस्था के लम्बे चलने के पीछे एक कारण यह भी रहा की इसे धर्म के साथ जोड़ दिया गया और व्यक्ति या समाज धर्म का पालन करने मैं गौरवान्वित महसूस करते है (वैसे डर भी एक कारण है) |

मेरी तरफ से मैं यह दावा तो प्रस्तुत नहीं कर सकता की मैंने विवाह के सभी धार्मिक एवं सामाजिक पहलुँओं का अध्यन किया है परन्तु काफी हद तक समझने की कोशिश अवश्य की है सभी पहलुँओं पर विचार करने का अर्थ शायद किस्से को बहुत लम्बा खिंच देगा इसीलिए सिर्फ एक मसले पर विचार करना उचित है जोकि विवाह से जुडी हुई जिम्मेदारियों से जुड़ा हुआ है

 

अगर प्राचीन भारत से जुड़े हुए साहित्य महाभारत, रामायण आदि का अध्यन किया जाये तो एक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है की विवाह नामक संस्था मैं जिम्मेदारियों को 3 भागों मैं बांटा जा सकता है

 

(1) घरेलु जिम्मेदारी

(2) बाहरी जिम्मेदारी

(3) धार्मिक जिम्मेदारी

 

शायद धार्मिक जिम्मेदारी (रामायण मैं एक प्रकार आता है जिसमे राम एक यघ करना चाहते है और उनको सीता की मूर्ति बना कर रखने यघ मैं बैठने का आदेश मानना पड़ता है क्योंकि पत्नी के बिना यघ पूर्ण नहीं हो सकता) ऐसी है जिसमें पति एवं पत्नी दोनों सहयोगिक रूप से निभाते है इसके अलावा घरेलु जिम्मेदारी (घर की व्यवस्था जैसे की भोजन) पूरी तरह से पत्नी पर तथा बाहरी जिम्मेदारी (भोजन के लिए आवश्यक धन आदि की व्यवस्था) पति पर डाली गयी है

क्या यह व्यवस्था सही है ?

शायद यहां पर सही अथवा गलत का प्रश्न नहीं है बल्कि प्रश्न सिर्फ व्यवस्था का है जब तक समाज एक व्यवस्था पर चल रहा है समाज से सम्बंधित लोग नियमों पर चलते रहेंगे परन्तु यदि समाज मैं बदलाव आता है तो समाज से सम्बंधित लोगो को भी बदलना पड़ेगा बदलाव आवश्यक भी है क्योंकि वक़्त बदलने पर यदि नियम नहीं बदले जाते तो निश्चित रूप से संस्था लम्बे समय तक नहीं रह सकती यदि यह बदलाव संतुलित रूप से हो तभी स्थायी हो सकता है अन्यथा संस्था के विध्वंस का कारण बन सकती है|

वर्तमान समाज इसी प्रकार के विध्वंस को देख रहा है विशेष रूप से विवाह नमक संस्था वर्तमान समाज के नियम बदल रहे है बदलने की रफ़्तार शायद बहुत तेज़ है शायद इसका मुख कारण साइंस के क्षेत्र मैं होने वाली क्रांति से है परन्तु समाज बदल रहा है इसीलिए आवश्यक यह है की विवाह से सम्बंधित नियमों मैं भी बदलाव हो परन्तु यह बदलाव संतुलित होना चाहिए अगर असनतुलित बदलाव होगा तो निश्चित रूप से विवाह नमक संस्था जल्द ही खत्म हो जाएगी

क्या पिछले कुछ दशकों मैं हुआ बदलाव काफी हद तक असंतुलित हुआ है सवाल यह पैदा होता है की कौनसे बदलाव की यहाँ बात हो रही है इससे पहले की हुए बदलावों की बात की जाये यह जरूरी है की कुछ घटनाओं का विचार किया जाये

 

वैसे तो बहुत सारी घटनाएं है शायद अनगिनत परन्तु मैं सिर्फ 2 घटनाओं का जीकर करना चाहूंगा पहली घटना रामायण से है रामायण के 3 पात्र लक्ष्मण, हनुमान एवं रावण जब राम लक्ष्मण से सीता के गहनों को पहचानने के लिए कहते हैं तो लक्ष्मण कहता है की उसने कभी सीता का चेहरे की तरफ नज़र उठा कर नहीं देखा इसी प्रकार हनुमान जब सीता से मिलता है तो सीता को माता कह कर पुकारता है इसीप्रकार रावण भी जिक्कर भी महत्वपूर्ण है कहा जाता है की रावण की कैद मैं सीता कई महीनों तक रही परन्तु कैद के दौरान रावण ने सीता को बेइज्जत नहीं किया इसके अलावा सुग्रीव  एवं वानर सेना भी पीछे नहीं रही यह सब घटनाये महिला के प्रति पुरुष की इज़्ज़त को प्रदर्शित करती है

 

यदि किसी को रावण गुजरे ज़माने की घटना लगे तो उसके लिए महारानी पद्मिनी का उद्धरण दिया जा सकता है जहां पर महाराजा पद्मिनी को विरोधी राजा के हवाले करके आसानी से अपनी एवं सेना की जान बचा सकते थे परन्तु महाराजा ने महारानी पद्मिनी की इज़्ज़त बचने के लिए खुद की एवं सैनकों की जान की परवाह नहीं की

 

एक और उद्धरण दिया जा सकता है जोकि 1857 की आजादी की लड़ाई के वक़्त का है जब कई अंग्रेज स्त्रियां भारतीय सिपाहियों की कैद मैं फस गयी तो उन्होंने महिलाओं को सुरक्षित अंग्रेज छावनी तक पहुंचा दिया (इस तरह की घटनाये बहुत है परन्तु मैं जिस घटना का जीकर कर रहा हूँ वह दिल्ली से सम्बंधित है एवं उस वक़्त की है जब भारतीय सिपाही मेरठ से दिल्ली पहुँच कर कब्ज़ा कर लेते है, इस घटना का जीकर न केवल साहित्य मैं बल्कि इंग्लैंड मैं छपने वाली कई किताबों एवं न्यूज़ पेपर मैं भी मिलता है)

जब हम इन घटनाओ का जिक्कर कर रहे है तो सीता एवं पद्मिनी का व्यव्हार की विचारणीय है सीता ने रावण के प्रस्ताव ना मानकर एवं पद्मिनी ने जोहर करके महाराजा का साथ दिया एवं बेहतरीन उद्धरण पेश किया

परन्तु यह घटनाएं सिर्फ चंद घटनाएं नहीं है पूरा भारतीय इतिहास ऐसी ही घटनाओं से भरा हुआ है यदि कोई अध्यन करना चाहे तो लाखों या शायद उससे भी ज्यादा प्रमाणित उद्धरण दिए जा सकते है

यह सभी घटनाएं भारतीय पुरुषों के उच्च चरित्र का उद्धरण है परन्तु अचानक दृश्य कैसे बदल गया अचानक वही पुरुष जो बेहतरीन चरित्र का मालिक था सभी बुराइयों की जड़ बन गया रेपिस्ट बन गया आखिर ऐसा क्या हुआ ?

ऐसा नहीं है की परिवर्तन मैं हज़ारों साल लगे हो बल्कि मुख्य परिवर्तन पिछले २० सालों मैं ही हुआ है शायद इसका कारण सम्पर्क साधनों मैं हुए अप्रतयषित वृद्धि है पिछले २० या ३० सालो मैं संपर्क साधन बहुत बढ़ गए है और अन्य संस्कृतियां जो की भारतीय संस्कृति को प्रभावित करने की स्थिति मे आ गयी जिसने बहुत तेज़ी से असन्तुलित रूप से परिवर्तन को बढ़ावा दिया जिसके परिणाम स्वरुप परिभाषायें भी बदल गयी जो नियम या व्यवस्थाएं किसी वक़्त उन्नति या सामजस्य का कारण रही वही नीयम डिस्क्रिमिनेशन दिखाई देने लगे इस लिए नहीं की यह डिस्क्रिमिनेशन था बल्कि इसलिए क्योंकि परिभाषा बदल गयी एक उद्धरण से इसे समझा जा सकता है जैसे की मैंने पहले कहा की घरेलू व्यवस्था देखना महिलाओं के हिस्से मैं आया था और बहरी जिम्मेदारी पुरुषों के हिस्से आयी और यह व्यवस्ता सदियों तक सफल सामाजिक व्यवस्था का निर्माण कर स्की क्योंकि महिलाओं ने अपना हिस्से की जिम्मेदारी और पुरुषों ने अपने हिस्से की जिम्मेदारी अच्छी तरह से निभाई परन्तु वही बदलते वक़्त के साथ पुरुष द्वारा महिलाओं पर किये अत्याचार के रूप मैं देखा जाने लगा|

बदलते परिदृश्य ने महिलाओं को अपनी जिम्मेदारी से मुक्त करने के प्रयास शुरू कर दिया परन्तु यह बदलाव असंतुलित बन गया क्योंकि महिलाओं को उनकी जिम्मेदारी से मुकत कर दिया गया परन्तु पुरुषों को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया गया ऐस मैं यह कहा जा सकता है बदलाव असनतुलित हो गया यदि हुआ बदलाव दोनों को जिम्मेदारियों से मुक्ति प्रदान करता तब शायद बदलाव असंतुलित एवं विध्वंसकारी नहीं होता बल्कि प्रगति दायक होता परन्तु ऐसा हो नहीं सकता

यह मुमकिन है की कुछ लोग बदलावों के समर्थक हो और कुछ अन्य बदलावों के समर्थन मैं न हो ऐसे मैं दोनों पक्षों मैं खींचतान स्वाभाविक है ऐसी खींचतान प्रेमविवाह बालविवाह आदि कई मामलों मैं पहले भी देखने को मिली है परन्तु खींचतान विनाश का कारण तभी बन सकती है जब की परिवर्तन असंतुलित हो वर्तमान ने कई कारणों जैसे की राजनैतिक (वोट बैंक) एवं सामाजिक (अविश्वास एवं स्वार्थ) कारणों से परिवर्तन संतुलित नहीं हो पा रहा

उद्धरण के तौर पर बहुत सारे लोगों को यह कहते हुए सुना जाता है की ‘मैंने अपनी लड़की को लड़को की तरह पाला है‘ या ‘मेरी लड़की लड़को से कम नहीं है‘ अधिकांश मामलों मैं इस प्रकार की लड़कियां घरेलु जिम्मेदारी निभाने के लायक नहीं बनाई जाती और न ही बाहरी जिम्मेदारी निभाने लायक | भारतीय व्यवस्था मैं लड़कों को बचपन से ही बहरी जिम्मेदारी उठाने लायक बनाया जाता है वर्तमान मैं लड़कों को घरेलु जिम्मेदारी के लायक बनाने की अपेक्षा भी की जाती है मतलब की दोहरी जिम्मेदारी परन्तु लड़कियों की दोनों जिम्मेदारियों से मुक्त किया जा रहा है शायद काफी लोग सहमत न हो तो ऐसे मैं कुछ उद्धरण पेश किये जा सकते है

1) भोजन की व्यवस्था करना पुरुष की जिम्मेदारी थी वर्तमान मैं यह व्यवस्था या उससे भी एक कदम आगे बढ़ कर अपना ली गयी है वर्तमान मैं ऐसे कानून पास कर दिए गए है की पत्नी कहीं भी रहे चाहे वह पति के साथ रहे या अपने किसी प्रेमी के साथ उसे खर्च देने की जिम्मेदारी पति की है |

2) पत्नी अगर अपने प्रेमी के साथ physical relation बनाना चाहे तो पति आपत्ति नहीं कर सकता बल्कि आपत्ति करने का मतलब सिर्फ जुर्म करना है

3) बच्चों की समस्त जिम्मेदारी उठाने के बावजूद उसे बच्चों से मिलने का अधिकार पत्नी की मर्ज़ी पर निर्भर करता है

4) बेटे जब 18 वर्ष के हो जाये तब उनकी जिम्मेदारी उठाना पिता की मर्ज़ी पर रखा गया परन्तु बेटी आगे 40 की भी हो तो भी उसकी जिम्मेदारी कानूनन पिता पर रखी गयी और यदि विवाहित हो तो पति पर |

5) पत्नी किसी भी अन्य पुरुष से सम्बन्ध बना सकती है एवं पति आपत्ति नहीं कर सकता

6) पत्नी अगर पति से सम्बन्ध न बनाना चाहे तो यह उसका अधिकार है परन्तु अगर पति सम्बन्ध न बनाना चाहे तो यह पत्नी के प्रति क्रूरता है |

 

इसके अलावा एक और मामला है जो देखने में ही अजीब लगता है | महिला के माता पिता की जिम्मेदारी उसके पति पर डाल दी गयी (पति की जिंदगी में उसके सास ससुर का योगदान कुछ भी नहीं है) | यानि की महिला को सब अधिकार तो दिए गए परन्तु उसकी जिम्मेदारी उठाने के लिए हमेशा एक अन्य आदमी की तलाश की गयी |

यह सिर्फ चाँद उद्धरण है जिनसे स्पस्ट है की विवाह नमक संस्था के नियम एकतरफा बदल गए है जो की अन्यायपूर्ण है वर्तमान मैं वोट बैंक की राजनीति के कारण TTT बिल के द्वारा एक बार फिर से न केवल पुरुष वर्ग से उसके अधिकार छीन लिए गए है बल्कि पुरुष वर्ग को अपराधी घोषित करने की नयी परिभाषा भी बना दी गयी है और ऐसा पहली बार नहीं हुआ बल्कि लगातार होता रहा है जिससे की पुरुष वर्ग को अपराधी चरित्रहीन आदि घोषित किया जाता रहा है स्पस्ट है की पुरुष वर्ग अपराधी नहीं है बल्कि उसे अपराधी घोषित करने के लिए परिभाषाएं बदल दी गयी है

विवाह नमक संस्था पूरी तरह एकतरफा बना दी गयी है ऐसे मैं इस संस्था का भविष्य क्या है ?

यह सवाल महतवपूर्ण है परन्तु यदि समाज में जाकर लोगो से पुछा जाये की वह विवाह करना चाहते है या नहीं तो एक मुद्दा सामने आता है की अधिकांश लोग विवाह से तो परिचित है परन्तु विवाह के साथ जुड़े हुए कानूनों से बिलकुल परिचित नहीं है ऐसे मैं समाज से आये हुए इनपुट्स के आधार पर किया गया निर्णय सही नहीं हो सकता हमे जागरूक इनपुट्स से ही निर्णय करना पड़ेगा और जागरूक इनपुट से मिला हुआ जवाब सिर्फ एक ही बात कहता है की ‘Sword is a Sword, Even if we call it Needle, It is risky to get marry, There are great great chances that you may lose your reputation/money/life everything you have‘.

ऐसे मैं क्या विवाह इतना आवश्यक है की सब कुछ गवा कर भी विवाह किया जाये मेरे विचार से यह संभव नहीं है बहुत सारे पुरुष इसे समझ चुके है और जो नहीं समझ रहे वह भी जल्द ही समझ जायेगे एवं अंत मैं विवाह नमक संस्था का समाप्त होता तय है यदि भारतीय समाज से बाहर निकल कर देखे तो पाएंगे की अधिकांश पुरुष विवाह को प्राथमिकता नहीं देते भारतीय अभी इस परिस्थिति से थोड़ा दूर हैं परन्तु इतना दूर नहीं की इसे देखा ही न जा सकता हो

ऐसे मैं सोचा जा सकता है की क्या विवाह नमक संस्था को बचाना जरूरी है या बचाया जा सकता है?

यह महत्वपूर्ण नहीं है की इस सवाल का जवाब क्या है महत्वपूर्ण है की यह सवाल उठ खड़ा हुआ है ऐसे मैं जवाब समझने के लिए एक परिस्थिति पर विचार करते है

मान लीजिये की किसी कमरे मैं 3 कुर्सियां मौजूद है और उस कमरे मैं 6 लोग आते है तो 6 लोग 3 कुर्सियों का इस्तेमाल कैसे करेंगे समस्या विकट है परन्तु इस समस्या के कई हल हो सकते है

सभी 6 लोग 3 कुर्सियां share karke बैठ सकते है

सभी लोग ज़मीन पर बैठ सकते है

3 लोग कुर्सियों पर और 3 ज़मीन पर

3 लोगों को कमरे से भगाया जा सकता है

3 नई कुर्सियां बनाई जा सकती है (Iron Men)

3 लोगों को मार दिया जाये तो बचे हुए 3 लोग 3 कुर्सियों पर बैठ सकते है (By Thonas)

 

इसके अतिरिक्त भी अन्य कई उपाय आ सकते है और सच भी यही है की अलग अलग लोग अपने समझ के अनुसार अलग अलग उपाय अपनाएंगे 

करीब करीब यही व्यवस्था विवाह के लिए भी है विवाह के साथ जुड़े खतरों को देखते हुए निश्चित है की विवाह एक ऐसी संस्था बन जायेगा जोकि अवांछित होगी परन्तु कुछ लोग सभी खतरों को नज़रअंदाज़ करके भी विवाह करते रहेंगे यही आज हम अमेरिकी समाज मैं देख रहे है अमेरिका मैं अधिकांश युवा विवाह नहीं कर रहे है और कुछ कर भी रहे है शायद यही भारतीय विवाह का भी भविष्य है

तो क्या यह एक बुरा भविष्य है ?

नहीं इसका बुरा या अच्छा होने से कोई विशेष लेना देना नहीं है समस्या सिर्फ वर्तमान है जबकि पुरुष जागरूक नहीं है उनको नहीं पता की विवाह करके दाव पर क्या लगा रहा है और कितनी बड़ी कीमत वह चुकाने जा रहे है एक बार जागरूकता आ जाये तब पुरुष अगर दाव खेलना चाहेगा तो यह उसकी अपनी इच्छा अनुसार होगा जब जुआ खेला जाता है तो खेलने वाले को पता रहता है की वह दाव हार भी सकता है परन्तु विवाह नाम के जुए मैं वर्तमानं मैं दाव बिना riskfactor की जानकारी के ही लगाए जा रहे है

ऐसे मैं जो लोग दाव लगा चुके है और अब वह दाव से बाहर आना चाहते है उनके लिए समस्या गंभीर हो सकती ऐसे लोगों के लिए न केवल इमोशनल लेवल पर समस्या है बल्कि सामाजिक एवं कानूनी तौर पर भी समस्या है क्योंकि पुरुष अनजाने मैं विवाह नमक संस्था जोकि उसके लिए एक जाल बन चुकी है उसमे फसा है उसके लिए जाल से निकलने का निर्णय इमोशनल लेवल पर घातक है क्योंकि उसे विवाह के जो सपने समाज ने दिखाए या यूँ कहें की समाज ने उसे गुमराह किया विवाह वह सुनहरा सपना नहीं निकला ऐसे मैं पुरुष के लिए यह इमोशनली एक झटका है इसके अलावा उसके सामने सामाजिक एवं लीगल दबाव भी है

सामाजिक तौर पर तलाक को अभी उस हद तक स्वीकार्यता नहीं मिल पायी है हिन्दू संस्कृति मैं विवाह का प्रावधान तो रखा गया परन्तु तलाक का प्रावधान नहीं रखा गया क्योंकि जिस वक़्त के समाज ने हिन्दू संस्कृति का निर्माण किया उस वक़्त विवाह जीवन बल्कि 7 जन्म का बंधन माना गया इसीलिए तलाक का प्रावधान नहीं रखा गया बदलते वक़्त ने तलाक के प्रावधान को कानूनी रूप दिया परन्तु परन्तु सामाजिक तौर पर अभी भी कुछ लोग इसे स्वीकार नहीं कर पाए है एवं तलाक को बुरी एवं बदनामी लायक हरकत मानते है

ऐसा ही एक उद्धरण मेरे सामने आया जिसमे की call करने वाले पुरुष ने कहा की उसके परिवार एवं रिश्तेदारों मैं किसी का तलाक नहीं हुआ … … … … … … इस तरह की सोच पुरुष पर भारी समाजीक दबाव का काम करती है इसके अलावा एक अन्य पुरुष भी मेरे मित्र है जोकि हमेशा इस बात पर जोर देते हैं की हिन्दू संस्कृति मैं तलाक का प्रावधान ही नहीं है हुए बदलावों को वह हमेशा इग्नोर/अस्वीकार कर देते है इस तरह का व्यव्हार अधिक कॉमन है इस व्यव्हार को समझने के लिए अमिश त्रिपाठी की ‘शिवा ट्रिओलोग्य‘ अथवा ‘क्षितिज की संतान‘ एक बेहतरीन पुस्तक हो सकती है इसके अलावा भी कई पुस्तकें है जो बदलावों की अस्वीकृति को बेहतरीन तरीके से एक्सप्लेन कर सकती है

इसके अलावा कानूनी मुश्किलें भी हैं जिनका सामना पुरुष को करना पड़ता है मुख्य तौर पर पुरुष को कई तरह के आपराधिक आरोप भी कोर्ट मैं झेलने पड़ सकते है इसके अतिरिक्त न केवन कानूनी प्रावधान बल्कि कानूनी प्रावधानों की पालन करवाने वाले भी बहुत अधिक झुकाव रखते है और यह झुकाव पुरुषों के विरोध मैं है इसलिए यही कोई पुरुष विवाह रुपी जाल से निकलने की सोच भी ले तो इस प्रयास मैं उसका तमाम ज़िंदगी की मेहनत एवं इज़्ज़त और कई मामलों मैं तमाम ज़िन्दगी गुजर सकती है एक उद्धरण के तौर पर हम उस व्यक्ति को ले सकते है जिसने 33 साल की आयु मैं तलाक की अर्जी दाखिल की और आज उसकी आयु 45 वर्ष है परन्तु अभी तक उसकी आप्लिकेशन लोअर कोर्ट मैं ही पेंडिंग चल रही है जबकि पिछले 12 सालों के दौरान उस पर 7 आपराधिक मामले दायर किये गए जिनमे से उसको बाइज़्ज़त बार किया गया

इस समस्त घटनाक्रम का एक पहलु नफरत का और भी है जिसपर शायद अधिकांश लोग सोचना भी नहीं चाहते फिर से उसी व्यक्ति का उद्धरण ले सकते है जिसका तलाक का केस 12 साल बाद भी पेंडिंग है जब मैं उस व्यक्ति से बात की तो सामने सिर्फ इतना ही आया की अब उस व्यक्ति के दिल मैं लड़की और परिवार के लिए इस हद तक नफरत भर चुकी है की वह किसी भी कीमत पर कोई भी फैंसला नहीं करना चाहता बल्कि वह लड़की के परिवार के हर सदस्य को अपना दुश्मन मानता है और दुश्मनी अपनी मृत्यु तक निभाने का इच्छुक है चाहे इसकी कोई भी कीमत उसे चुकानी पड़े यह उद्धरण व्यक्तिगत दुश्मनी का है अगर इस उद्धरण को छोड़ दिया जाये भी दिया जाये तो अन्य कई उद्धरण सामने आये है सबसे नया उद्धरण मीतू के बाद आया जब कई पुरुषों ने महिलाओं के साथ काम करने से इंकार कर दिया क्योंकि वह इसे अपने लिए सुरक्षित नहीं मानते अतः स्पस्ट है की महिला अवं पुरुष के बीच दूरियां बढ़ रही है जब तक परिवर्तन स्वीकार्य होगा तब तक महिला अवं पुरुष इस हद तक दूर हो चुके होंगे की शायद कोई व्यवस्था दूरियों को भर न पाए और ऐसा सिर्फ इसीलिए क्योंकि परिवर्तन संतुलित न होकर पुरुष विरोधी रह गया है

 

हाल ही मैं सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया निर्णय जिसके टहल मैरिटल रपे द्वारा गर्भधारण को महिला अपनी इच्छा अनुसार कभी भी गर्भपात करवा सकती है | यह निर्णय न केवल मैरिटल रपे की अवधारणा को स्थापित करता है बल्कि पिता को सिर्फ एक स्पर्म डोनर के रूप में स्थापित करता है | यक़ीनन यह निर्णय आने वाले वर्षों में पुरुष की आँखें खोलने वाला साबित होगा | बेशक अभी अगले कुछ सालों में कई पुरुषों को कुर्बान होना पड़ेगा परन्तु अंततः उसे समझ आ ही जायेगा की उसकी भूमि अब सिर्फ एक प्रोवाइडर या गुलाम की है जिसके पास कोई अधिकार नहीं |

शायद यही वक़्त है जबकि हमें स्वीकार करना होगा की विवाह का अर्थ अपना पूरा जीवन की मेहनत दाव पर लगाना है और यही नयी जनरेशन को बताने की एवं जागरूक करना ही वक़्त की जरूरत है

Marriage is A Sword accept it before it is too Late

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