पुरुष एवं महिला साहित्यकार

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पुरुष एवं महिला साहित्यकार

आजाद परिंदा

वैसे तो मैं एक स्वस्थ एवं सामान्य व्यक्ति हूं परंतु वर्तमान परिदृश्य में में स्वयं को कुछ हद तक असामान्य भी पाता हूं । जहां वर्तमान पीढ़ी अपना खाली समय मोबाइल पर गेम खेलने में या सोशल मीडिया पर वीडियो आदि देखने या बनाने में व्यतीत करती है वही में अपना खाली समय किताबों के साथ व्यतीत करता हूं । अभी हाल ही में दिल्ली में एक पुस्तक मेला लगा और अखबार की हेडलाइन बना इस पुस्तक मेले में लगे चाट के ठेले । जी हां पुस्तक मेले के दौरान हाईलाइट कोई पुस्तक नहीं बल्कि चाट की दुकानें बनी क्योंकि चाट की बिक्री किताबों की बिक्री से 10 गुना अधिक हुई । ना जाने क्यों इसे पुस्तक मेला कहा गया क्यों नहीं इसे चाट मेला कहा जाना चाहिए ?

अखबार की हेडलाइन यह बताने के लिए काफी है की वर्तमान जेनरेशन पुस्तकों से काफी दूर निकल आई है । अब इस जेनरेशन के लिए पुस्तकें प्राथमिकता नहीं है ।

वैसे तो इस अरुचि के कई कारण गिनवाए जा सकते है जिनमे से मुख्य है सूचना एवम मनोरंजन के अन्य विकल्प का उपलब्ध होना । यदि किसी को कोई सूचना चाहिए तो पहले उसे किताबों को खंगालना पड़ता था अब उसे सिर्फ इंटरनेट पर जाना है जोकि लगभग हर वक्त उसके पास रहता है ।

परंतु एक अन्य महत्वपूर्ण कारण और भी है या यूं कहा जाए की एक अन्य महत्वपूर्ण कारण और भी हो सकता है और वो है लिटरेचर का समाज से टूटता नाता।

वर्षों तक किताबों से जुड़े होने का नतीजा यह है की मेरे पास अपनी एक छोटी सी लाइब्रेरी बन गई है । इस लाइब्रेरी में तकरीबन 5000 किताबें है और इनमे से अधिकांश मैने पढ़ी है । कई कारणों से कुछ किताबें नहीं भी पढ़ी परंतु ऐसी किताबें अधिक नहीं है ।

जब मैं प्रेम चंद्र या शरत चंद्र या ऐसे ही किसी लेखक की रचना पढ़ रहा होता हूं तो मुझे पात्र अपने आसपास से उठाए हुए महसूस होते है । में स्वयं उन पत्रों से जुड़ाव महसूस करता हूं । जैसे जैसे पात्र अपना सफर तय करते है में भी उनके साथ साथ ही सफर का आनंद ले रहा होता हूं । परंतु वर्तमान साहित्य में इस जुड़ाव का सर्वथा अभाव सा दिखाई देता है ।

अगर हाल फिलहाल के समय पर नजर डालें तो साहित्य की तीन मुख्य विचारधाराओं का विस्तार दिखाई देता है । एक विचारधारा वो है जिसमे किसी माइथोलॉजिकल पात्र को नए तरीके से पेश किया जा रहा है । दूसरी विचारधारा वो है जिसमे पुरुष को खलनायक के रूप में पेश किया जा रहा है । और तीसरी विचारधारा वो है जिसमे जासूसी / थ्रिल / सस्पेंस आदि के द्वारा मनोरंजन किया जाता है ।

कुछ लेखक माइथोलॉजिक पात्रों को नया रूप दे रहे है परंतु इनकी संख्या बहुत कम है । वही दूसरी तरफ व्यवसायिक साहित्य है जो सिर्फ मनोरंजन को उद्देश्य बना कर तीसरी विचारधारा पर कलम चला रहा है । इन सबसे अलग दूसरी विचारधारा पर लिखने वालो की संख्या अनापेक्षित रूप से बहुत अधिक है ।

वर्तमान में दूसरी विचारधारा पर ही मुख्य रूप से काम होता दिखाई देता है । लगभग हर महिला लेखक इसी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती दिखाई दे रही है । इस नई लेखिकाओं की पीढ़ी ने महिला सशक्तिकरण का अर्थ ही बना दिया है की पुरुष को भला बुरा कहा जाए उसे नीचा दिखाया जाए और महिला पत्र की काल्पनिक महिमामंदन किया जाए । इस साहित्य के दोनो पात्र समाज का हिस्सा नहीं है ।

जब मैं सबसे पुराना साहित्य के विषय में सोचता हूं तब मेरा मस्तिष्क रामायण पर रुक जाता है । रामायण एक माइथोलॉजिकल साहित्य है जिसमे पक्ष और विपक्ष तो है परंतु विलेन का अभाव सा दिखाई देता है (धार्मिक दृष्टिकोण से प्रेरित व्यक्ति सहमत नहीं हो सकेंगे) । यदि रामायण में किसी खलनायक की तलाश की जाए तो भी अधिक से अधिक ककायेयी या मंथरा तक ही सीमित रहना पड़ता है परंतु उनका वर्णन भी कुछ इस तरीके से है की उन्हें भी खलनायक मानना उचित प्रतीत नहीं होता । दूसरा महाकाव्य महाभारत में खलनायक रामायण की अपेक्षा अधिक मुखर है परंतु फिर भी महाभारत को लगभग रामायण जैसी श्रेणी में रखा जा सकता है ।

इसके अतिरिक्त अन्य बहुत सारी साहित्यिक रचनाएँ मौजूद है जिनके मूल में खलनायक अवश्य है परंतु जहां तक महिला खलनायक की बात आती है तो महिला खलनायक को भी एक तरीके से जस्टिफाई करते हुए वर्णित दिखाई देते है । अधिकांश साहित्य में खलनायक है अपनी पूरी क्षमता के साथ परंतु खलनायिका को एक तरीके से खलनायिका के रूप में दिखाने से परहेज दिखाई देता है । बल्कि अधिकांश साहित्य महिला पात्रों को देवी स्वरूपा दिखाने का प्रयास करता है । और यह साहित्य मुख्य रूप से पुरुष साहित्यकारों द्वारा रचित है । अगर इस एक पंक्ति में कहना हो तो मैं कुछ इस तरह से कहूंगा की पुरुष साहित्यकारों ने महिला पात्रों को हमेशा देवी के रूप में महिमामंडित करने का प्रयास किया । और यदि कहीं खलनायिका के रूप में पेश किया भी तो मर्यादा का उल्लंघन दिखाई देना लगभग असंभव ही है ।

बदलते वक्त के साथ हालात भी बदलते रहे परंतु साहित्य का पुराना स्वरूप कम से कम महिला पात्रों के मसले में नहीं बदला। शरत चंद्र के कई उपन्यास देखे जा सकते है जिनमें महिलाएं अपने अलग अलग आयाम के साथ मौजूद है परंतु कहीं पर भी महिला पत्र को ऐसा नहीं दिखाया गया जिससे की उन पात्रों के प्रति दुर्भावना पैदा हो ।

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